Sanatan Dharma • सनातन परम्परा
ॐसनातन — जिसका न आदि है, न अन्त
"सब सुखी हों, सब निरोग हों, सब कल्याण देखें, कोई दुःख न पाए।"
देवी-देवता और मंत्र देखेंहिन्दू धर्म को "सनातन धर्म" भी कहते हैं। यह किसी एक ग्रंथ या एक संस्थापक पर नहीं, बल्कि वेद, उपनिषद, गीता और ऋषियों के अनुभव पर आधारित जीवन-पद्धति है। "एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति" — सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।
सम्पूर्ण सृष्टि के पीछे एक ही चेतना है। देवी-देवता उसी एक परमात्मा के अलग-अलग गुणों और शक्तियों के रूप हैं।
शरीर नश्वर है, आत्मा अजर-अमर है। गीता कहती है कि आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है।
जैसा कर्म, वैसा फल। हमारे आज के कर्म ही हमारा भविष्य और अगला जन्म तय करते हैं।
आत्मा कर्मों के अनुसार जन्म-मृत्यु के चक्र में घूमती है, जब तक उसे मोक्ष न मिल जाए।
धर्म (कर्तव्य), अर्थ (साधन), काम (इच्छा-पूर्ति) और मोक्ष (मुक्ति) — मानव जीवन के चार लक्ष्य।
ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग और राज योग — ईश्वर तक पहुँचने के चार मार्ग, जो अलग-अलग स्वभाव के लोगों के लिए हैं।
परमात्मा की तीन प्रमुख शक्तियाँ तीन देवों के रूप में पूजित हैं।
सृष्टि की रचना करते हैं। वेदों के ज्ञान के प्रतीक।
सृष्टि का पालन करते हैं। धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं।
अज्ञान और अहंकार का संहार कर नवसृजन का मार्ग खोलते हैं।
प्रत्येक देवता का स्वरूप, उनकी शक्ति और उनका बीज या प्रमुख मंत्र। मंत्र का जप शुद्ध उच्चारण और श्रद्धा से करें; गुरु या विद्वान से सीखना उत्तम है।
मंत्र का प्रभाव उच्चारण, श्रद्धा और नियमितता से बढ़ता है।
ब्रह्ममुहूर्त या प्रातः और सायं का समय सर्वोत्तम माना गया है।
स्वच्छ स्थान पर कुशा या ऊनी आसन पर सीधे बैठकर जप करें।
108 मनकों की माला से जप करें। नियमित संख्या तय कर लें।
मन शान्त रखें और अर्थ का स्मरण करते हुए श्रद्धा से जप करें।