त">
Gurukul Vidya Series • गुरुकुल विद्या
ॐआत्मज्ञान का महासागर
"असत्य से सत्य की ओर ले जाओ। अंधकार से प्रकाश की ओर। मृत्यु से अमरत्व की ओर।" — बृहदारण्यक उपनिषद
उपनिषद — वेदों का अन्तिम, सर्वोच्च और सर्वाधिक गहन भाग। इन्हें वेदान्त (वेद का अन्त) भी कहते हैं। ये वे रहस्यमय संवाद हैं जो गुरु और शिष्य के बीच वन में, एकांत में, ब्रह्ममुहूर्त में हुए — जहाँ आत्मा, ब्रह्म और मोक्ष के परम रहस्य उजागर किए गए।
उपनिषदों में जगत की उत्पत्ति, मृत्यु के बाद क्या होता है, ईश्वर कहाँ है और मनुष्य का परम लक्ष्य क्या है — इन प्रश्नों के सर्वोच्च उत्तर दिए गए हैं। विश्व के महानतम विचारक — शोपेनहाउर, इमर्सन, नीत्शे — सभी उपनिषदों से प्रभावित थे।
शोपेनहाउर ने कहा था — "उपनिषद मेरे जीवन की सांत्वना थे और मेरी मृत्यु की भी सांत्वना होंगे।"
प्रत्येक वेद से जुड़े उपनिषदों की संख्या और उनके नाम
आदि शंकराचार्य ने जिन दस उपनिषदों पर भाष्य लिखा, वे "दशोपनिषद" कहलाते हैं। ये सर्वाधिक प्रमाणित और अध्ययनीय हैं।
सबसे छोटा किन्तु सबसे गहन उपनिषद — केवल 18 मंत्र। इसमें त्याग, कर्म, ज्ञान और भक्ति का अद्भुत समन्वय है। महात्मा गांधी ने कहा था — "यदि सब उपनिषद नष्ट हो जाएँ और केवल ईशोपनिषद बचे, तो भी भारतीय दर्शन जीवित रहेगा।"
चेतना (Consciousness) का गहन अन्वेषण। किसने आँखों को देखने की शक्ति दी? किसने कानों को सुनने की? किसने मन को सोचने की? यह ब्रह्म ही है जो सबकी शक्ति है, किन्तु जिसे इन्द्रियाँ स्वयं नहीं जान सकतीं।
बालक नचिकेता यमराज के पास जाकर पूछता है — "मृत्यु के बाद क्या होता है?" यमराज तीन दिन भूखे रखकर भी वरदान देते हैं। यह उपनिषद आत्मा की अमरता, श्रेय-प्रेय का भेद और मोक्ष के मार्ग को अत्यंत सजीव रूप में प्रस्तुत करता है।
छः शिष्य ऋषि पिप्पलाद के पास जाते हैं। प्रत्येक एक महान प्रश्न पूछता है — जीव की उत्पत्ति, प्राण की श्रेष्ठता, ओंकार का रहस्य, स्वप्न-सुषुप्ति का ज्ञान, सोलह कलाएँ और मृत्यु के बाद का मार्ग। आधुनिक जीव-विज्ञान और मनोविज्ञान से आश्चर्यजनक साम्यता।
भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य "सत्यमेव जयते" इसी उपनिषद से लिया गया है। इसमें परा विद्या (ब्रह्मज्ञान) और अपरा विद्या (वेद, विज्ञान, कला) का अंतर समझाया गया है। ब्रह्म को अग्नि और जगत को उसकी चिनगारियाँ बताया गया है।
केवल 12 मंत्रों में पूर्ण ब्रह्मज्ञान! आचार्य गौडपाद के अनुसार — "यह एकमात्र उपनिषद मोक्ष के लिए पर्याप्त है।" इसमें ओंकार के अ-उ-म तीन मात्राओं और तुरीय (चौथी) अवस्था के माध्यम से चेतना का सम्पूर्ण मानचित्र प्रस्तुत किया गया है।
तीन वल्लियों में — शिक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्ली — गुरुकुल की शिक्षा, ब्रह्म की परिभाषाएँ और पंचकोश सिद्धांत। आनंद की सात परतें (ब्रह्मानन्दवल्ली) — मानव आनंद से ब्रह्मानंद तक। "सत्यं वद, धर्मं चर" — यह गुरु का आदेश इसी उपनिषद में है।
ऋग्वेद का प्रमुख उपनिषद। तीन अध्यायों में — सृष्टि की उत्पत्ति, पाँच इन्द्रियों और प्राण का शरीर में प्रवेश, और आत्मा के तीन जन्मों का रहस्यमय वर्णन। "प्रज्ञानं ब्रह्म" — चेतना ही ब्रह्म है — यह महावाक्य इसी उपनिषद का है।
108 उपनिषदों में सबसे बड़ा। आठ अध्यायों में ओंकार, सामगान, उद्गीथ, पंचाग्नि विद्या और नौ उपमाओं से "तत्त्वमसि" की व्याख्या। सत्यकाम जाबाल की कथा — एक अविवाहिता माता के पुत्र को भी ब्रह्मज्ञान मिला। गुरुकुल की उदारता का प्रमाण।
दशोपनिषदों में सबसे विशाल। छः अध्यायों में — सृष्टि के तीन भाष्य, शहद-विद्या, पंचाग्नि-विद्या, याज्ञवल्क्य-गार्गी का तर्क-युद्ध और याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी का प्रेम-संवाद। "नेति नेति" — "यह नहीं, यह नहीं" — ब्रह्म को नकार से परिभाषित करने की अद्भुत पद्धति।
ये विचार मानव इतिहास के सर्वोच्च दार्शनिक चिन्तन का फल हैं
ब्रह्म एकमेवाद्वितीयम् — ब्रह्म एक है, दूसरा कोई नहीं। यह सच्चिदानंद — सत् (अस्तित्व), चित् (चेतना) और आनंद का स्वरूप है। न रूप, न रंग, न काल, न देश में बद्ध।
आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। यह नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त और स्वयंप्रकाश है। "अयम् आत्मा ब्रह्म" — यह आत्मा ब्रह्म से अभिन्न है।
अज्ञान से ब्रह्म में जगत दिखता है — जैसे रस्सी में साँप। यह माया ब्रह्म की शक्ति है जो अनेकता का आभास कराती है। ज्ञान से माया का पर्दा हटता है।
जन्म-मृत्यु के चक्र (संसार) से मुक्ति। आत्मा का ब्रह्म में विलय। यह मृत्यु के बाद नहीं — इसी जीवन में "जीवन्मुक्ति" संभव है।
व्यक्ति आत्मा (जीव) और विश्वात्मा (ब्रह्म) एक ही हैं। जैसे घड़े का आकाश और बाहर का आकाश — दो नहीं, एक ही। यही अद्वैत का सार है।
कर्म के अनुसार अगला जन्म मिलता है। शुभ कर्म से स्वर्ग, अशुभ से नरक और ज्ञान से मोक्ष। पंचाग्नि विद्या में मृत्यु के बाद की यात्रा का विस्तृत वर्णन।
ये वाक्य सहस्रों वर्षों से मानव-चेतना को जागृत करते आए हैं
The method of negation — whatever you think Brahman is, It is beyond that.
— याज्ञवल्क्य, बृहदारण्यकोपनिषद
प्रत्येक उपनिषद का अध्ययन इन शान्तिपाठों से आरम्भ होता है — मन को शान्त और ग्रहणशील बनाने के लिए
मुक्तिकोपनिषद में राम ने हनुमान को 108 उपनिषदों की सूची दी
गुरुकुल की पद्धति — श्रवण से समाधि तक
उपनिषदों के बारे में जिज्ञासु मन के प्रश्न