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Gurukul Vidya Series • षड्वेदांग
The Science of Language
"वाणी अनादि और नित्य है, स्वयंभू ने इसे प्रकट किया। यह आदि में वेदमयी दिव्य भाषा थी, जिससे सभी व्यवहार प्रारम्भ हुए।"
व्याकरण — वेद का मुख है। जैसे शरीर बिना मुख के अधूरा है, वैसे ही वेद-ज्ञान बिना व्याकरण के अधूरा है। यह वह शास्त्र है जो भाषा को शुद्ध, सटीक और अर्थपूर्ण बनाता है।
भारतीय व्याकरण की परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन और वैज्ञानिक व्याकरण-परंपरा है। महर्षि पाणिनि की अष्टाध्यायी — 3,959 सूत्रों में सम्पूर्ण संस्कृत भाषा का नियमन — विश्व की अद्भुत बौद्धिक उपलब्धि है।
नासा के वैज्ञानिक Rick Briggs ने 1985 में कहा था — "संस्कृत ही वह एकमात्र भाषा है जो कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है, क्योंकि इसका व्याकरण पूर्णतः त्रुटिरहित और वैज्ञानिक है।"
महर्षि पाणिनि — वह विभूति जिसने एकाकी बैठकर सम्पूर्ण संस्कृत भाषा को 3,959 सूत्रों में समेट दिया। यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी बौद्धिक उपलब्धियों में से एक है।
पाणिनि से पहले भी इन्द्र, चन्द्र, काशकृत्स्न, आपिशलि, गार्ग्य, शाकटायन जैसे वैयाकरण हुए। पाणिनि ने इन सबके ज्ञान को आत्मसात कर एक सर्वांगपूर्ण व्याकरण रचा।
पाणिनि की अष्टाध्यायी इतनी संक्षिप्त और पूर्ण है कि विश्व के भाषाशास्त्री आज भी इसे चमत्कार मानते हैं। इसमें प्रत्येक सूत्र इतना कम्पैक्ट है — जैसे एक कम्प्यूटर प्रोग्राम।
3,959 सूत्रों में सम्पूर्ण संस्कृत व्याकरण। प्रत्येक अध्याय में चार पाद।
व्याकरण की मूलभूत परिभाषाएँ और संज्ञाएँ — वृद्धि, गुण, इत्, अनुनासिक, सवर्ण की परिभाषा। अनुवृत्ति का नियम।
कारक (कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, अधिकरण) के नियम। समास-विधान का विस्तृत वर्णन।
धातुओं से बनने वाले कृदन्त प्रत्यय — कृत्, तव्यत्, अनीयर्, क्त, क्तवतु आदि। क्रियाओं से संज्ञा निर्माण।
संज्ञाओं से बनने वाले तद्धित प्रत्यय — अण्, इञ्, यञ् आदि। अपत्य, गुण, देश-विशेष वाचक शब्द निर्माण।
तद्धित प्रत्ययों का विस्तार। समूह, संख्या, वयस्, परिमाण और स्त्री प्रत्ययों के नियम।
स्वरों की सन्धि, वृद्धि, गुण, सम्प्रसारण, दीर्घ-ह्रस्व के नियम। अंगाधिकार — शब्दांग के विकार।
आगम (नए वर्णों का जोड़) और आदेश (प्रतिस्थापन) के नियम। धातु-रूप में इट् आगम के नियम।
पद-स्तर की सन्धि, विसर्ग सन्धि, व्यंजन सन्धि। निपात, अव्यय और विराम के नियम। अन्तिम अध्याय।
पाणिनि के कुछ महत्वपूर्ण सूत्र और उनके नियम
पाणिनि ने अपनी व्याकरण के लिए वर्णमाला को एक विशेष क्रम में सजाया — जिसे शिवसूत्र या माहेश्वर सूत्र कहते हैं। कथा है कि भगवान शिव के डमरू से 14 बार ध्वनि निकली जिससे ये 14 सूत्र बने।
अन्तिम वर्ण (ण्, क्, ङ्, च्, ट्, ण्, म्, ञ्, ष्, श्, व्, य्, र्, ल्) — ये इत् हैं। इन्हें छोड़कर शेष वर्णों से प्रत्याहार बनते हैं।
इन सूत्रों से बने प्रत्याहार वर्णों के समूहों के लिए संक्षिप्त नाम हैं — जैसे modern shortcodes।
दो वर्णों के मिलने पर जो ध्वनि-परिवर्तन होता है, उसे सन्धि कहते हैं। संस्कृत और हिन्दी दोनों में।
दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से एक नया शब्द बनाने की प्रक्रिया को समास कहते हैं।
पूर्वपद (अव्यय) प्रधान होता है। यह क्रियाविशेषण का काम करता है।
उत्तरपद प्रधान होता है। पूर्वपद उत्तरपद से कारक-सम्बन्ध रखता है।
पूर्वपद विशेषण और उत्तरपद विशेष्य। दोनों पद समान विभक्ति में।
पूर्वपद संख्यावाचक होता है। समूह या समाहार का बोध।
दोनों पद प्रधान। शब्दों का संयोग — 'और' सम्बन्ध।
कोई भी पद प्रधान नहीं — दोनों मिलकर किसी तीसरे का विशेषण।
क्रिया के साथ संज्ञा का सम्बन्ध दर्शाने की प्रणाली — संस्कृत व्याकरण का हृदय।
| विभक्ति | कारक | अर्थ | प्रत्यय (उदाहरण) | सूत्र | उदाहरण |
|---|---|---|---|---|---|
| प्रथमा | कर्ता | करने वाला | सु, औ, जस् | कर्तृकारकः प्रथमा | रामः गच्छति |
| द्वितीया | कर्म | जिस पर क्रिया हो | अम्, औट्, शस् | कर्मणि द्वितीया | रामः फलम् खादति |
| तृतीया | करण | साधन / माध्यम | टा, भ्याम्, भिस् | साधकतमं करणम् | रामः हस्तेन लिखति |
| चतुर्थी | सम्प्रदान | जिसके लिए / को | ङे, भ्याम्, भ्यस् | कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् | विप्राय धनं ददाति |
| पञ्चमी | अपादान | जहाँ से अलग हो | ङसि, भ्याम्, भ्यस् | ध्रुवमपाये ऽपादानम् | वृक्षात् पत्रं पतति |
| षष्ठी | सम्बन्ध | सम्बन्ध / का, के, की | ङस्, ओस्, आम् | षष्ठी शेषे | रामस्य पुस्तकम् |
| सप्तमी | अधिकरण | स्थान / में, पर | ङि, ओस्, सुप् | आधारोऽधिकरणम् | वने मृगः अस्ति |
| सम्बोधन | — | पुकारना / हे! | सु (विशेष) | सम्बुद्धिः | हे राम! इह आगच्छ |
पाणिनि की अष्टाध्यायी ने न केवल भारत को — पूरे विश्व की भाषाशास्त्र को प्रभावित किया
Backus-Naur Form (BNF) — प्रोग्रामिंग भाषाओं को define करने की पद्धति — पाणिनि की सूत्र-शैली से ली गई है। FORTRAN, ALGOL, आधुनिक भाषाएँ इसी नींव पर।
1786 में Sir William Jones ने संस्कृत की यूरोपीय भाषाओं से समानता बताई — यहीं से Indo-European भाषा परिवार की खोज हुई। आधुनिक भाषाशास्त्र का जन्म।
NASA और IIT के शोधकर्ता संस्कृत की अस्पष्टता-मुक्त (unambiguous) संरचना को Artificial Intelligence के लिए उपयोग कर रहे हैं। Machine Translation में संस्कृत सर्वश्रेष्ठ।
Ferdinand de Saussure — आधुनिक भाषाशास्त्र के जनक — पाणिनि से प्रेरित थे। Leonard Bloomfield ने कहा — "पाणिनि की अष्टाध्यायी मानव बुद्धि का स्मारक है।"
पतंजलि के महाभाष्य ने अष्टाध्यायी की 1,228 से अधिक स्थानों पर व्याख्या की। काशिकावृत्ति (जयादित्य-वामन), न्यास — व्याकरण की अखण्ड परंपरा।
गुरुकुल में व्याकरण अनिवार्य विषय था। बिना व्याकरण-ज्ञान के वेद-पाठ नहीं। आज भी काशी, पुणे और उडुपी में वेद-व्याकरण की पाठशालाएँ चल रही हैं।
व्याकरण शास्त्र के बारे में सामान्य जिज्ञासाएँ