Gurukul Vidya Series · दैवज्ञ विद्या
The Eye of the Vedas
"Jyotisha is the Eye of the Vedas — it illuminates the past, present and future." — Vedanga tradition
ज्योतिष — ज्योति + ईष = प्रकाश का स्वामी। यह षड्वेदांगों में से एक है — वेद का नेत्र। ज्योतिष केवल भविष्यवाणी का शास्त्र नहीं, यह काल, ग्रह, और मानव-जीवन के अन्तःसम्बन्धों का गहन विज्ञान है।
वैदिक ज्योतिष तीन स्कन्धों (स्तम्भों) पर आधारित है — सिद्धांत (गणितीय खगोलशास्त्र), होरा (जन्मकुण्डली और फलित), और संहिता (प्राकृतिक और सामूहिक भविष्यवाणी)।
पराशर होरा शास्त्र, बृहत् जातक, ज्योतिष रत्नमाला — ये ग्रन्थ ज्योतिष का आधार हैं। वराहमिहिर (5वीं सदी), आर्यभट्ट, कल्याणवर्मन — इन आचार्यों ने ज्योतिष को वैज्ञानिक आधार दिया।
राशि-चक्र — 360° में 12 बराबर भाग, प्रत्येक 30°। चार तत्वों में विभाजित — अग्नि, पृथ्वी, वायु, जल।
प्रथम राशि। साहस, नेतृत्व, नवारम्भ। मेष कुण्डली में लग्न।
स्थिरता, धन, सौन्दर्य-प्रेम। भोग-विलास। वृषभ — शुक्र की स्वराशि।
द्विस्वभाव, बुद्धि, संचार, लेखन। बुध की स्वराशि। जिज्ञासु।
मातृत्व, गृह-प्रेम, भावुकता। चन्द्र की स्वराशि। अनुभूतिशील।
राजसी गुण, प्रभुत्व, सत्ता। सूर्य की स्वराशि। आत्मसम्मान।
विश्लेषण, सेवा, विवेक, कुशलता। बुध की द्वितीय स्वराशि।
न्याय, सन्तुलन, साझेदारी। शुक्र की द्वितीय स्वराशि। व्यवहार-कुशल।
गहनता, रहस्य, परिवर्तन। अष्टम भाव-प्रधान। जन्म-मृत्यु।
दर्शन, धर्म, उच्च-शिक्षा, विस्तार। गुरु की स्वराशि। आशावादी।
कर्म, अनुशासन, दीर्घकालिक लक्ष्य। शनि की स्वराशि। परिश्रमी।
मानवता, नवाचार, समाज-सेवा। शनि की द्वितीय राशि। विद्रोही।
अध्यात्म, मोक्ष, करुणा। गुरु की द्वितीय राशि। सहज-ज्ञान।
वैदिक ज्योतिष में नौ ग्रह — सात दृश्य और दो छाया-ग्रह। प्रत्येक ग्रह का जीवन के विभिन्न क्षेत्रों पर विशेष प्रभाव।
आत्मा, पिता, सरकार, स्वास्थ्य, यश का कारक। पिता का प्रतिनिधि। सिंह राशि का स्वामी। उच्च — मेष में, नीच — तुला में।
मन, माता, भावनाएँ, जल, यात्रा। कर्क राशि का स्वामी। उच्च — वृष में। मन-स्वास्थ्य और भावनात्मक संतुलन का कारक।
भाई, साहस, ऊर्जा, भूमि, सेना, शल्य-चिकित्सा। मेष और वृश्चिक का स्वामी। उच्च — मकर में। मंगल-दोष का विचार।
बुद्धि, वाणी, व्यापार, गणित, लेखन, मामा। मिथुन और कन्या का स्वामी। उच्च — कन्या में। शिक्षा और संचार का कारक।
धर्म, ज्ञान, सन्तान, गुरु, विस्तार, विवाह (स्त्री की कुण्डली में)। धनु और मीन का स्वामी। उच्च — कर्क में। सर्वाधिक शुभ ग्रह।
प्रेम, विवाह, सौन्दर्य, वाहन, ऐश्वर्य, कला। वृष और तुला का स्वामी। उच्च — मीन में। पुरुष की कुण्डली में पत्नी का कारक।
कर्म, न्याय, दीर्घायु, मृत्यु, दुःख, सेवा, तपस्या। मकर और कुम्भ का स्वामी। उच्च — तुला में। शनि साढ़े-साती और ढैया।
माया, विदेश, तकनीक, अचानक घटनाएँ, महत्वाकांक्षा। छाया-ग्रह। मिथुन में उच्च। सूर्य-चन्द्र के साथ युति — ग्रहण।
मोक्ष, अध्यात्म, विरक्ति, रहस्य-विद्या, पूर्व-जन्म। राहु का विपरीत बिन्दु। धनु में उच्च। ध्यान और साधना का कारक।
कुण्डली के बारह भाव जीवन के बारह क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रत्येक भाव का एक कारक और एक नैसर्गिक स्वामी।
व्यक्तित्व, शरीर, स्वास्थ्य, जन्म, आत्म-प्रकटन
धन, परिवार, वाणी, खानपान, बचत
भाई-बहन, साहस, यात्रा, संचार, शिक्षा
माता, घर, वाहन, भूमि, सुख, शान्ति
सन्तान, बुद्धि, प्रेम, शिक्षा, पूर्वकृत-पुण्य
रोग, शत्रु, ऋण, सेवा, दैनिक कार्य
विवाह, साझेदारी, व्यापार, विदेश-यात्रा
आयु, मृत्यु, उत्तराधिकार, रहस्य, तंत्र
भाग्य, धर्म, पिता, तीर्थ, उच्च-शिक्षा
कर्म, व्यवसाय, यश, सरकार, सामाजिक स्थिति
लाभ, मित्र, बड़े भाई, आय, इच्छा-पूर्ति
व्यय, विदेश, मोक्ष, एकान्तवास, अध्यात्म
विंशोत्तरी दशा — वैदिक ज्योतिष की सर्वाधिक प्रयुक्त दशा-पद्धति। 120 वर्षों में नौ ग्रहों की महादशाएँ। जन्म-नक्षत्र के स्वामी से प्रारम्भ।
ग्रहों की विशेष स्थितियों से बनने वाले योग — जो जीवन को असाधारण बनाते हैं।
कोण-भाव (1, 5, 9) के स्वामी और केन्द्र-भाव (1, 4, 7, 10) के स्वामी की युति या दृष्टि। शुभ ग्रहों का उच्च में होना। व्यक्ति को राजा जैसा यश और सफलता मिलती है।
द्वितीय और एकादश भाव-स्वामी की युति या सम्बन्ध। धनेश-लाभेश का परस्पर सम्बन्ध। बृहस्पति या शुक्र की दशा में अचानक धन-लाभ।
चन्द्र से बृहस्पति केन्द्र में (1, 4, 7, 10) होने पर। व्यक्ति गज जैसी शक्ति और सिंह जैसे साहस का धनी। वराहमिहिर ने इसे अत्यंत शुभ माना।
पाँच ग्रह (मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि) जब अपनी उच्च या स्वराशि में केन्द्र में हों। रुचक (मंगल), भद्र (बुध), हंस (गुरु), मालव्य (शुक्र), शश (शनि)।
सभी ग्रह राहु-केतु के मध्य एक ओर हों तो काल-सर्प योग बनता है। जीवन में बाधाएँ, संघर्ष, अप्रत्याशित घटनाएँ। पर राहु शुभ प्रभाव हो तो असाधारण सफलता भी।
6, 8, 12 भाव के स्वामी परस्पर केन्द्र में या आपस में युत हों। दुःख-स्थानों के स्वामी मिलकर शुभ फल देते हैं। संकट के बाद अप्रत्याशित उन्नति।
वैदिक ज्योतिष में ग्रह-दोष शान्ति और जीवन-उन्नति के लिए विविध उपाय।
ग्रह के अनुकूल रत्न धारण। सूर्य — माणिक्य, चन्द्र — मोती, मंगल — मूँगा। शुभ मुहूर्त और सटीक भार में धारण करने से ग्रह का बल बढ़ता है।
प्रत्येक ग्रह का बीज-मन्त्र। सूर्य — "ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः"। निश्चित संख्या में जप — 7000, 11000, 21000। शुभ ग्रह के दिन और समय में।
ग्रह-शान्ति हवन। ग्रह के अनुकूल समिधा, आहुति। महादशा-प्रारम्भ में विशेष हवन। सामूहिक हवन अत्यधिक प्रभावशाली।
शनि — तिल, काले कपड़े, लोहा। शुक्र — चावल, सफेद वस्त्र। राहु — नीले वस्त्र। ग्रह के दिन और उचित पात्र को दान — ग्रह-दोष शान्त होता है।
सूर्य — सूर्य-नमस्कार, आदित्यहृदयम्। चन्द्र — शिव-पूजा। मंगल — हनुमान-पूजा। बुध — विष्णु सहस्रनाम। गुरु — बृहस्पतिवार व्रत।
श्री यन्त्र, नवग्रह यन्त्र, राहु-केतु यन्त्र। विधिवत् स्थापित और प्राण-प्रतिष्ठित यन्त्र — ग्रह के दिव्य प्रभाव को घर में आकर्षित करते हैं।